नमस्कार, मैं 'द फ्रीलांस' से वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर व खोजी पत्रकार। आज हम एक ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं जो सदियों से मानवीय भय, जिज्ञासा और अंधविश्वास का केंद्र रहा है - 'पाము' यानी सर्प या सांप। भारतीय संस्कृति में सांप को जहां एक ओर भगवान शिव के आभूषण के रूप में पूजनीय स्थान प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर इसे मृत्यु के पर्याय के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वन्यजीव संरक्षण कानूनों के बावजूद, ग्रामीण भारत में आज भी सर्प दंश और इससे जुड़े अंधविश्वासों का एक काला जाल फैला हुआ है।
पारिस्थितिकी तंत्र में सांपों की अनिवार्य भूमिका
पर्यावरणविदों के अनुसार, प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में सांपों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह जीव खाद्य श्रृंखला की एक ऐसी कड़ी है जो कृषि के सबसे बड़े शत्रुओं यानी चूहों और अन्य कृन्तकों (rodents) की संख्या को नियंत्रित रखता है। यदि सांपों का अस्तित्व खतरे में पड़ता है, तो फसलों को भारी नुकसान पहुंच सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। इसके बावजूद, जानकारी के अभाव में लोग सांप देखते ही उसे मार देते हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा झटका है।
अंधविश्वास और 'सपेरा' संस्कृति की हकीकत
हमारी खोजी टीम द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, आज भी देश के कई दूरदराज इलाकों में सर्प दंश का इलाज अस्पतालों की बजाय तांत्रिकों और ओझाओं के माध्यम से कराने की कुप्रथा जारी है। 'नाग पंचमी' जैसे पर्वों पर सांपों को पकड़कर उनका प्रदर्शन करना और उन्हें दूध पिलाना (जबकि सांप दूध नहीं पचा सकते) वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद, वन्यजीव तस्कर और पारंपरिक सपेरे इस अवैध व्यापार में संलिप्त पाए जाते हैं। द फ्रीलांस की पड़ताल में यह बात सामने आई कि सोशल मीडिया पर भी सांपों के रेस्क्यू के नाम पर सनसनी फैलाने वाले वीडियो की बाढ़ आ गई है, जो कई बार गैर-कानूनी और खतरनाक साबित होते हैं।













