परिचय: वैश्विक सत्ता का अप्रचलित ढांचा
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक व्यवस्था आज अपनी प्रासंगिकता खोती नजर आ रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का ढांचा दशकों पुराना है, जो वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने में विफल साबित हो रहा है। 'द फ्रीलेंस' के खोजी विश्लेषण के अनुसार, दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों को आज भी निर्णय लेने की मुख्य टेबल पर वह स्थान नहीं मिला है, जिसके वे हकदार हैं।
स्थायी सदस्यता और वीटो पावर का पेंच
सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (P5)—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—के पास वीटो का अधिकार है। यह शक्ति संतुलन 1945 के दौर की याद दिलाता है, जब एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देश औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। आज भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति के केंद्र हैं, फिर भी उन्हें नीतिगत फैसलों में वह अधिकार प्राप्त नहीं है। भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वीटो पावर का यह केंद्रीकरण वैश्विक संकटों जैसे कि रूस-यूक्रेन संघर्ष या पश्चिम एशिया के तनाव में संयुक्त राष्ट्र को पंगु बना देता है।
सुधार की राह में अड़चनें और कूटनीतिक गतिरोध
सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लंबे समय से उठ रही है, लेकिन यह प्रक्रिया भारी कूटनीतिक गतिरोध का शिकार है। कई देश क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के चलते एक-दूसरे की उम्मीदवारी का विरोध करते हैं। उदाहरण के लिए, एशिया में शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय दावों के कारण सर्वसम्मति बनना बेहद कठिन हो गया है। इसके अलावा, वर्तमान स्थायी सदस्य अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। 'द फ्रीलेंस' की पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि जब तक वीटो पावर के उपयोग और स्थायी विस्तार पर आम सहमति नहीं बनती, तब तक संयुक्त राष्ट्र महज एक मूकदर्शक बनकर रह जाएगा।












