अखिलेश यादव और स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच बढ़ती दूरियां
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी से अलग हुए नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर एक बार फिर बेहद कड़ा और दोटूक रुख अपनाया है। 'द फ्रीलेंस' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट और विभिन्न मीडिया स्रोतों से प्राप्त जानकारियों के मुताबिक, अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि स्वामी प्रसाद मौर्य अब उनके राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संदेश दे दिया गया है कि इस तरह के बयानों और विवादों को अब तवज्जो देने की जरूरत नहीं है, सीधे शब्दों में कहें तो 'अवॉइड करो'।
पीडीए (PDA) फॉर्मूला और बयानों की सियासत
सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव की नाराजगी की मुख्य वजह स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा पार्टी के मूल पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और उसकी परिभाषा को लेकर दिए गए बयान रहे हैं। हाल के दिनों में मौर्य के बयानों से पार्टी की वैचारिक लाइन को नुकसान पहुंच रहा था। कभी पीडीए में 'डी' का अर्थ दलित बताने वाले मौर्य, तो कभी इसे डिंपल यादव से जोड़ने जैसे बयानों ने समाजवादी पार्टी के भीतर असहजता पैदा कर दी थी। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि ऐसे बयानों से चुनावी माहौल में भटकाव पैदा होता है, खासकर तब जब पार्टी पूरी तरह से आगामी रणनीतियों पर फोकस करना चाहती है।
प्रशासनिक फेरबदल और अन्य राजनीतिक हलचल
एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी अपने कुनबे को दुरुस्त करने और अंतर्विरोधों को खत्म करने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी में भी लगातार फेरबदल देखने को मिल रहा है। हाल ही में राज्य सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर बड़ा कदम उठाते हुए 11 पीसीएस अधिकारियों के तबादले किए हैं। इसके तहत राज बहादुर को बुलंदशहर का एडीएम और संजय कुमार यादव को लखनऊ नगर निगम में नई जिम्मेदारी सौंपी गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव और राजनीतिक समीकरणों के बीच प्रशासनिक कसावट भी सरकार के एजेंडे का अहम हिस्सा है।











