नई दिल्ली: 'द फ्रीलांस' के लिए विशेष खोजी रिपोर्ट। भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता और दलीय जुबानी जंग का दौर चरम पर है। हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद (MLC) चुनावों के नतीजों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एमएलसी चुनावों के परिणामों को लेकर कांग्रेस पार्टी पर कसे गए तंज ने राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है, जिसके बाद बैलेट पेपर बनाम ईवीएम (EVM) का पुराना विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय पटल पर आ गया है।
प्रधानमंत्री का तंज और सत्ता पक्ष का हमला
विभिन्न मीडिया स्रोतों से प्राप्त प्राथमिक जानकारियों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एमएलसी चुनावों के नतीजों के बाद सोशल मीडिया और अपने संबोधनों के जरिए कांग्रेस पार्टी की चुनावी हार पर कटाक्ष किया था। इस सिलसिले में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी कांग्रेस के खराब प्रदर्शन पर तीखा तंज कसते हुए 'जीरो चेक कर लो भाई' जैसी टिप्पणियां कीं। सत्ता पक्ष का यह मानना है कि जनता ने विपक्ष की नीतियों और उनके नेतृत्व को पूरी तरह से नकार दिया है, जो इन स्थानीय और विधान परिषद चुनावों के परिणामों में साफ झलकता है।
कांग्रेस का पलटवार और बैलेट पेपर की चुनौती
सत्ता पक्ष के इन हमलों पर कांग्रेस पार्टी भी आक्रामक रुख अपनाते हुए नजर आई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने एमएलसी चुनाव के नतीजों पर पीएम मोदी के ट्वीट और बयानों पर तीखा पलटवार किया। खेड़ा ने खुले तौर पर चुनौती देते हुए कहा, 'मैं आपको चुनौती देता हूं, बैलट पेपर से चुनाव कराकर देख लीजिए।' कांग्रेस का यह तर्क रहा है कि ईवीएम आधारित चुनावों में पारदर्शिता को लेकर उनके मन में जो आशंकाएं हैं, वे बैलेट पेपर से होने वाले चुनावों में दूर हो सकती हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि बिहार और अन्य राज्यों के विधान परिषद चुनावों में, जहां बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है, वहां भी विपक्ष को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है, जैसा कि ईटीवी भारत की रिपोर्ट्स में भी विश्लेषण किया गया है।












