प्रस्तावना: जीवन का अमृत या जहर?
संस्कृत में जिसे 'क्षीर' और हमारी लोक संस्कृति में जिसे जीवन का आधार माना गया है, वह दूध आज हमारे देश में एक गंभीर बहस का विषय बन चुका है। कन्नड़ भाषा के शब्द 'हाಲು' यानी दूध की गूंज सिर्फ दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस रसोईघर की कहानी है जहाँ शुद्धता की तलाश अब एक चुनौती बन चुकी है। 'द फ्रीलांस' के खोजी पत्रकारिता दल ने जब इस विषय पर पड़ताल शुरू की, तो परत-दर-परत ऐसे खुलासे हुए जो चौंकाने वाले थे।
महानगरों से लेकर गांवों तक मिलावट का जाल
हमारी फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान यह बात सामने आई कि डेयरी सेक्टर में मांग और आपूर्ति के भारी अंतर के कारण मिलावट का अवैध कारोबार तेजी से फैल रहा है। सिंथेटिक दूध से लेकर यूरिया, डिटर्जेंट और स्टार्च के इस्तेमाल की खबरें आम हो चली हैं। पशुपालकों से लेकर बड़े डेयरी ब्रांड्स तक की सप्लाई चेन में ऐसे कई छिपे हुए बिंदु हैं जहाँ गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। स्थानीय स्तर पर मिलने वाले 'हाಲು' (दूध) के नमूनों की जब प्रयोगशाला में जांच कराई गई, तो उनमें आवश्यक वसा और एसएनएफ (SNF) के स्तर में भारी अंतर पाया गया।
अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य पर गहराता संकट
दूध सिर्फ एक पेय पदार्थ नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में करोड़ों किसान दुग्ध उत्पादन पर निर्भर हैं। लेकिन मिलावट के इस काले कारोबार ने ईमानदार किसानों और स्थानीय डेयरी संचालकों की कमर तोड़ दी है। दूसरी ओर, आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। चिकित्सकों का मानना है कि यूरिया और डिटर्जेंट युक्त दूषित दूध का सेवन करने से गुर्दे (किडनी), लीवर और पाचन तंत्र पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह और भी अधिक घातक साबित हो रहा है।












