परिचय: कಬ್ಬು (गन्ना) की राजनीति और हकीकत
कर्नाटक के कृषि और आर्थिक परिदृश्य में 'कಬ್ಬು' (गन्ना) हमेशा से एक केंद्रीय मुद्दा रहा है। राज्य के दक्षिणी और उत्तरी हिस्सों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती की जाती है, जो लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है। हालांकि, हाल के दिनों में यह नकदी फसल किसानों के लिए समृद्धि की बजाय चिंता का विषय बन गई है। उत्पादन लागत में बेतहाशा वृद्धि और चीनी मिलों द्वारा समय पर भुगतान न किए जाने के कारण जमीनी स्तर पर असंतोष उबल रहा है। 'द फ्रीलान्स' की विशेष टीम ने इस संकट के मूल कारणों की थाह लेने के लिए कर्नाटक की प्रमुख चीनी बेल्ट का दौरा किया और जो तथ्य सामने आए, वे बेहद चौंकाने वाले हैं।
बकाया भुगतान और किसानों का संघर्ष
खोजी पड़ताल के दौरान यह बात सामने आई कि राज्य की कई चीनी मिलों पर किसानों का करोड़ों रुपया बकाया है। सरकार द्वारा तय किए गए उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) के बावजूद, मिल मालिक किसानों को समय पर उनका मेहनताना नहीं दे रहे हैं। बेलगावी, बागलकोट और मांड्या जैसे जिलों में किसानों ने हाल ही में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए हैं। इन किसानों का आरोप है कि प्रशासन और मिल मालिकों की साठगांठ के कारण उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। एक स्थानीय किसान नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'हमने अपनी फसल उगाने के लिए भारी कर्ज लिया है, लेकिन मिलें छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हमारा भुगतान करने से कतरा रही हैं।'
उत्पादन लागत और बाजार की विसंगतियां
कब्बू की खेती में पानी और उर्वरकों की खपत बहुत अधिक होती है। पिछले कुछ वर्षों में डीएपी, यूरिया और बिजली के दामों में हुई बेतहाशा वृद्धि ने खेती की लागत को दोगुना कर दिया है। इसके विपरीत, खुले बाजार में चीनी के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह संकट विकराल रूप धारण कर सकता है। इसके अलावा, ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों के अभाव में भूजल स्तर भी तेजी से नीचे गिर रहा है, जिससे भविष्य में इस फसल का टिकना और भी मुश्किल हो जाएगा।













