'द फ्रीलांस' के विशेष अनुसंधान कक्ष से - भारत और अन्य दक्षिण एशियाई राज्यों में सार्वजनिक परिवहन की जब भी बात आती है, तो 'बस' (பேருந்து) आम आदमी की जीवनरेखा साबित होती है। ग्रामीण अंचलों से लेकर महानगरों की घनी सड़कों तक, बसें केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक गतिशीलता और आर्थिक रीढ़ का काम करती हैं। हाल के दिनों में इस क्षेत्र से जुड़ी कई प्रवृत्तियों और समस्याओं ने नीति निर्धारकों का ध्यान खींचा है।
यात्री सुविधा और बुनियादी ढाँचे का संकट
हमारे फील्ड रिपोर्टर द्वारा विभिन्न राज्यों के बस अड्डों और डिपो का जमीनी जायजा लिया गया। प्राथमिक जानकारियों से यह स्पष्ट होता है कि बुनियादी ढाँचे की कमी आज भी एक विकट समस्या बनी हुई है। कई स्थानों पर बसों की कमी, समय सारणी का पालन न होना और टिकट दरों में हालिया वृद्धि ने दैनिक यात्रियों की जेब पर भारी असर डाला है। विशेष रूप से महिला यात्रियों के लिए चलाई जा रही मुफ्त या रियायती बस यात्रा योजनाओं ने जहाँ एक ओर सामाजिक समावेश को बढ़ावा दिया है, वहीं दूसरी ओर इन योजनाओं के कारण राज्य परिवहन निगमों के वित्तीय घाटे में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
ईंधन के बढ़ते दाम और आधुनिकीकरण की दौड़
बसों के संचालन में सबसे बड़ी बाधा डीजल और सीएनजी के आसमान छूते दाम हैं। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक बसों (ई-बसों) की ओर बढ़ने का दबाव परिवहन निगमों पर भारी पड़ रहा है। हालाँकि पर्यावरण की दृष्टि से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी भविष्य की जरूरत है, लेकिन इसके लिए आवश्यक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और भारी शुरुआती निवेश ने निगमों की कमर तोड़ दी है। कई जिलों में अनुबंधित (कॉन्ट्रैक्ट) बसों और सरकारी बसों के बीच का संघर्ष भी सामने आया है, जिससे ड्राइवरों और कंडक्टरों की कार्यस्थितियाँ प्रभावित हो रही हैं।











