प्रस्तावना: सामाजिक सुरक्षा का मौन संकट
तमिलनाडु की प्रशासनिक और सामाजिक हलचल में इन दिनों 'ஓய்வூதியர்' (Oyvootiyar यानी पेंशनभोगी) शब्द केंद्र बिंदु बना हुआ है। 'द फ्रीलान्स' के विशेष खोजी अभियान के तहत जब हमने राज्य के विभिन्न जिलों का दौरा किया, तो यह बात स्पष्ट हो गई कि वरिष्ठ नागरिकों का यह वर्ग केवल अपनी मासिक वित्तीय सहायता की मांग नहीं कर रहा है, बल्कि यह मामला उनके सम्मानजनक अस्तित्व और जीवनयापन के बुनियादी अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
बढ़ती महंगाई और पेंशन की विसंगतियां
राजधानी चेन्नई से लेकर मदुरै और कोयंबटूर तक, सरकारी और संगठित क्षेत्र से सेवानिवृत्त हुए हजारों 'ஓய்வூதியர்' आज अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। जमीनी पड़ताल से यह तथ्य सामने आया है कि लगातार बढ़ती महंगाई के मुकाबले पेंशन का पुनरीक्षण उस गति से नहीं हो पा रहा है। चिकित्सा खर्चों में बेतहाशा वृद्धि ने वरिष्ठ नागरिकों की कमर तोड़ दी है। अधिकांश पेंशनभोगियों का कहना है कि उनकी आधी से अधिक पेंशन केवल जीवनरक्षक दवाओं और अस्पतालों के चक्कर काटने में खर्च हो जाती है।
प्रशासनिक और तकनीकी उलझनें
डिजिटलीकरण के इस दौर में जीवन प्रमाण पत्र जमा करने की प्रक्रिया, आधार सीडिंग और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसे तकनीकी बदलावों ने बुजुर्गों के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। कई दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में 'ஓய்வூதியர்' वर्ग के लोगों को तकनीकी ज्ञान के अभाव में महीनों तक अपनी पेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। हमारी खोजी टीम ने पाया कि बैंकिंग प्रणालियों में समन्वय की कमी और स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर संवेदनशीलता का अभाव इस समस्या को और विकट बना रहा है।













