द फ्रीलांस, विशेष रिपोर्ट: इज़राइल की सियासत में एक बार फिर भूचाल आता दिख रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन के चुनाव परिणामों में बहुमत से पिछड़ने की खबरों ने मध्य पूर्व से लेकर पश्चिमी देशों तक हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, अरब मीडिया में इसे लेकर विभिन्न प्रकार के विश्लेषण और कयास लगाए जाने लगे हैं। बीबीसी और अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय माध्यमों से मिल रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, इज़राइल की आंतरिक राजनीतिक स्थिरता पर अब गहरे सवाल खड़े होने लगे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू का यह राजनीतिक संकट केवल घरेलू सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भू-राजनीतिक परिणाम दूरगामी हो सकते हैं। एक तरफ जहां उनके समर्थकों और पार्टी द्वारा चुनावी प्रक्रिया में 'धांधली' के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी खेमा और क्षेत्रीय मीडिया इस स्थिति को नेतन्याहू के राजनीतिक पतन की शुरुआत के रूप में देख रहा है। अरब जगत के प्रमुख समाचार माध्यमों में इस बात पर विशेष चर्चा हो रही है कि क्या नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचाने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे या फिर देश में एक नया राजनीतिक समीकरण उभरेगा।
ईरानी खतरा और सत्ता की खींचतान
इस बीच, नवभारत टाइम्स समेत कुछ अन्य मीडिया स्रोतों में यह भी रेखांकित किया गया है कि नेतन्याहू खेमे की ओर से लगातार 'ईरानी खतरे को खत्म करने' के एजेंडे को सबसे ऊपर रखा जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या नेतन्याहू सत्ता से बेदखल होने की स्थिति में कुर्सी छोड़ने से इनकार कर सकते हैं या फिर संसद पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी आपातकालीन कदम का सहारा ले सकते हैं? हालांकि इज़राइली कानून और लोकतांत्रिक संस्थाएं बेहद मजबूत मानी जाती हैं, फिर भी वर्तमान संसद (नेसेट) के अंदर जिस तरह के समीकरण बन और बिगड़ रहे हैं, उसने अनिश्चितता के बादलों को और गहरा कर दिया है।
खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से देखें तो, जब भी कोई शीर्ष नेता अपनी राजनीतिक ज़मीन खोता हुआ दिखाई देता है, तो सुरक्षा और बाहरी खतरों का नैरेटिव और अधिक आक्रामक हो जाता है। इज़राइल के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। नेतन्याहू की पार्टी का यह दावा कि चुनावी परिणामों में हेरफेर हुई है, जनता के बीच अविश्वास के बीज बो रहा है।











