प्रशासनिक फेरबदल और आंतरिक चुनौतियां
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में है। हालिया घटनाक्रम में, आयोग ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लेते हुए तीन महीने बाद आईटी विभाग की निगरानी का जिम्मा पुनः वरिष्ठ चुनाव आयुक्त को सौंप दिया है। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब आयोग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता को लेकर देश भर में बहस छिड़ी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आईटी विभाग का नियंत्रण चुनाव प्रक्रिया की तकनीकी अखंडता के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है, और इस विभाग की कमान में बार-बार बदलाव आयोग की आंतरिक कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर गंभीर आरोप
आयोग के लिए संकट केवल प्रशासनिक फेरबदल तक सीमित नहीं है। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ केरल में एक गंभीर शिकायत दर्ज की गई है। शिकायतकर्ता ने उन पर दो करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगाया है। हालांकि ये आरोप अभी जांच के दायरे में हैं, लेकिन संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ इस तरह के दावे आयोग की साख के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। इन आरोपों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है और विपक्ष ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी है।
न्यायिक हस्तक्षेप और वोटर लिस्ट की विसंगतियां
इन प्रशासनिक और व्यक्तिगत विवादों के बीच, बॉम्बे हाईकोर्ट का एक हालिया आदेश चुनाव आयोग की जमीनी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है। 'स्पेशल इलेक्टोरल रोल रिवीजन' (SIR) के दौरान एक परिवार के छह सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए आयोग को निर्देश दिया है कि 10 दिनों के भीतर उन नामों को पुनः दर्ज किया जाए। यह घटना दर्शाती है कि डेटा प्रबंधन और मतदाता सूची के सत्यापन में कहीं न कहीं बड़ी चूक हो रही है, जिससे आम नागरिकों के मताधिकार पर संकट मंडरा रहा है।









