कर्नाटक राजनीति के अजातशत्रु या विवादों के नायक?
भारतीय राजनीति के दक्षिण भारतीय परिदृश्य में डीके शिवकुमार का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और राज्य के उपमुख्यमंत्री के रूप में उनकी राजनीतिक यात्रा संघर्ष, चातुर्य और सत्ता के गलियारों में प्रभाव की एक अनूठी कहानी कहती है। 'द फ्रीलांस' के इस विशेष अन्वेषण में हम डीके शिवकुमार के राजनीतिक सफर, उनके प्रभाव और वर्तमान परिदृश्य के उन पहलुओं को खंगाल रहे हैं जो सतह के पीछे छिपे हैं।
संकटमोचन की छवि और संगठनात्मक कौशल
शिवकुमार को हमेशा से कांग्रेस पार्टी का 'संकटमोचन' माना जाता रहा है। चाहे मध्य प्रदेश में सरकार बचाने की कवायद हो, महाराष्ट्र के विधायकों को कर्नाटक में संभालना हो या फिर गुजरात के राज्यसभा चुनावों के दौरान अहमद पटेल की नैया पार लगाना हो, पार्टी ने हर बड़े संकट में डीके पर भरोसा जताया है। जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ और संसाधनों के प्रबंधन की क्षमता उन्हें कांग्रेस के सबसे ताकतवर क्षत्रपों में शुमार करती है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 में पार्टी की ऐतिहासिक जीत के पीछे उनके रणनीतिक कौशल और अथक परिश्रम की अहम भूमिका रही थी।
कानूनी लड़ाइयां और केंद्रीय जांच एजेंसियों का साया
उनकी यह राजनीतिक सफलता आसान नहीं रही है। डीके शिवकुमार का नाम कई बार आयकर और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के घेरे में आया है। वर्ष 2017 में उनके ठिकानों पर हुई छापेमारी और तिहाड़ जेल में उनके कुछ हफ्ते बिताने का प्रकरण राजनीतिक गलियारों में खूब गूंजा था। उनके समर्थकों का हमेशा से यह मानना रहा है कि ये तमाम कार्रवाईयां राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा हैं, जबकि राजनीतिक विरोधियों का तर्क है कि कानून अपना काम कर रहा है। इन तमाम कानूनी पेंचों के बावजूद शिवकुमार का राजनीतिक ग्राफ लगातार ऊपर ही चढ़ता रहा है।













