इसराइल चुनाव: अनिश्चितता के दौर में नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य
द फ्रीलेंस की विशेष खोजी रिपोर्ट। इसराइल की राजनीति एक बार फिर एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ से आगे का रास्ता धुंधला और अनिश्चित दिखाई दे रहा है। हालिया संसदीय चुनावों के अब तक सामने आए रुझानों और परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश में राजनीतिक स्थिरता की बहाली इतनी आसान नहीं होगी। लगभग 85 प्रतिशत मतों की गिनती पूरी हो चुकी है और प्रारंभिक आंकड़े एक बार फिर खंडित जनादेश की ओर इशारा कर रहे हैं।
गठबंधन की रेस और बहुमत का जादुई आंकड़ा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके दक्षिणपंथी व धार्मिक सहयोगियों का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। उन्हें शुरुआती अनुमानों में लगभग 53 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। हालाँकि, इसराइल की संसद यानी 'नेसेट' में सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों के बहुमत के आंकड़े से यह गठबंधन अभी भी पीछे चल रहा है। इस स्थिति ने देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
क्या 'जानी दुश्मन' बनेंगे दोस्त? सत्ता के नए समीकरण
खोजी पत्रकारिता के तहत सामने आ रहे नए कयासों और मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने के लिए अप्रत्याशित समझौते देखने को मिल सकते हैं। इस बीच, नेतन्याहू और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले आइजेनकॉट के बीच बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनने (यानी 2-2 साल के लिए सत्ता साझा करने) के फॉर्मूले पर भी चर्चाएं गर्म हैं। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं इसराइली राजनीति की पेचीदगियों को बयां करती हैं।
किंगमेकर की भूमिका में अरब दल और मुस्लिम समुदाय
इस पूरे चुनावी गणित में एक सबसे दिलचस्प और अहम सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसराइल में रहने वाले अरब दल इस बार के चुनाव में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाएंगे? इसराइल के भीतर रहने वाले अरब मुस्लिम नागरिकों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनकी मतदान प्रवृत्ति इस बार सरकार के गठन में निर्णायक साबित हो सकती है। लंबे समय से हाशिए पर या विरोध में खड़े रहे इन दलों का रुख आने वाले दिनों में इसराइली संसद के समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।
आगे क्या संकेत मिल रहे हैं?
'द फ्रीलेंस' के विश्लेषण के अनुसार, अंतिम परिणाम आने के बाद भी इसराइल में एक स्थिर सरकार का गठन तुरंत संभव नहीं दिखता। छोटे दलों और वैचारिक रूप से ध्रुवीकृत धड़ों के बीच मोलभाव का दौर लंबा चल सकता है। यदि नेतन्याहू आवश्यक संख्या बल जुटाने में असफल रहते हैं, तो इसराइल एक बार फिर गहरे राजनीतिक संकट या संभावित रूप से नए चुनावों की तरफ धकेला जा सकता है। क्षेत्रीय सुरक्षा और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहे इसराइल के लिए यह अनिश्चितता का दौर बेहद संवेदनशील है।











