परिचय: वादों और हकीकत के बीच पिसता श्रमिक
भारतीय श्रम बाजार में 'वेतन' (Salary/Wages) शब्द आज केवल एक आर्थिक ताना-बाना नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता, नीतिगत विफलताओं और श्रमिक अधिकारों की अनदेखी का एक बड़ा दस्तावेज बन चुका है। 'द फ्रीलान्स' के विशेष खोजी अभियान के तहत जब देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों, असंगठित क्षेत्रों और कॉरपोरेट हब की जमीनी पड़ताल की गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कागजों पर न्यूनतम वेतन के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति बेहद निराशाजनक बनी हुई है।
असंगठित क्षेत्र और अनुबंध आधारित नौकरियों का सच
हमारी फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान यह बात खुलकर सामने आई कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और छोटे उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारियों को उनके तयशुदा घंटों से अधिक काम करने के बाद भी उचित वेतन नहीं मिलता है। कई स्थानों पर न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ठेकेदारी प्रथा के जरिए काम पर रखे जाने वाले श्रमिकों को न तो समय पर पारिश्रमिक मिलता है और न ही भविष्य निधि (PF) या स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा मिलती है।
कॉरपोरेट जगत में 'वेतन असमानता' और वर्क-लाइफ बैलेंस
दूसरी ओर, अगर हम कॉरपोरेट और स्टार्टअप संस्कृति की बात करें, तो वहां स्थिति बिल्कुल उलट लेकिन उतनी ही जटिल है। एक तरफ जहां उच्च प्रबंधन और तकनीकी विशेषज्ञों को लाखों-करोड़ों का पैकेज मिल रहा है, वहीं एंट्री-लेवल और सपोर्ट स्टाफ को आज भी महंगाई के इस दौर में गुजारे लायक वेतन पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 'वेतन हाइक' और 'इन्क्रिमेंट' के नाम पर मिलने वाला मामूली प्रतिशत, आसमान छूती महंगाई और कर (Tax) के बोझ के आगे बेदम नजर आता है।










