नई दिल्ली: 'द फ्रीलेंस' के लिए विशेष खोजी रिपोर्ट। भारतीय कृषि और खुले बाजार में इस समय गेहूं को लेकर विरोधाभासी और चौंकाने वाले रुझान देखने को मिल रहे हैं। एक ओर जहां भारतीय खाद्य निगम (FCI) की ई-नीलामी के बाद खुले बाजार में गेहूं की कीमतों में ₹344 प्रति क्विंटल तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है, वहीं दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्सों में अन्नदाता यानी किसान गेहूं के बेहतर बीज की एक-एक बोरी के लिए लंबी कतारों में संघर्ष करने को मजबूर हैं। यह स्थिति देश की कृषि अर्थव्यस्था के दो अलग-अलग छोरों की बानगी पेश करती है, जहां उपभोक्ता बाजार में राहत है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसान भारी परेशानियों से जूझ रहे हैं।
एफसीआई की ई-नीलामी और कीमतों में गिरावट
हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एफसीआई द्वारा की जा रही ई-नीलामी के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इसके जरिए खुले बाजार में गेहूं की उपलब्धता सुगम हुई है, जिसके परिणामस्वरूप कीमतों में ₹344 प्रति क्विंटल तक की कमी आई है। हालांकि, कुछ विशिष्ट राज्यों में मांग और स्थानीय कारणों से अभी भी कीमतों में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, लेकिन कुल मिलाकर थोक बाजार में मंदी का रुख है। सरकार के इस कदम का उद्देश्य बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाना और आम जनता तक सस्ते दर पर अनाज पहुंचाना है।
बीज वितरण की जमीनी हकीकत और किसानों की मुश्किलें
दूसरी तरफ, रबी सीजन की मुख्य फसल यानी गेहूं की बुवाई का समय आ चुका है, और हरियाणा के महेंद्रगढ़-नarnaul जैसे क्षेत्रों से जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे चिंताजनक हैं। धनतेरस जैसे पावन पर्व के दिन भी किसानों को गेहूं का प्रमाणित और उन्नत बीज प्राप्त करने के लिए मंडियों और केंद्रों के बाहर घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। हालांकि उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा लगभग 2,200 किसानों के बीच 3,200 कुंतल बीज बांटे जाने की आधिकारिक पुष्टि हुई है, लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच का यह भारी अंतर देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में साफ तौर पर देखा जा सकता है।












