त्योहारी सीजन में आम आदमी की जेब पर डाका
दीवाली का त्यौहार खुशियों का प्रतीक माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे जैसे महानगरों में यह त्यौहार आम यात्रियों के लिए एक आर्थिक संकट बनकर उभरा है। 'द फ्रीलांस' की पड़ताल में यह सामने आया है कि निजी बस संचालकों ने त्यौहार के नाम पर यात्रियों से मनमाना किराया वसूलना शुरू कर दिया है। सामान्य दिनों में जो किराया 800 से 1200 रुपये के बीच होता था, वह अब 7000 रुपये तक पहुंच गया है। यह स्थिति न केवल यात्रियों के लिए कष्टकारी है, बल्कि परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
प्रशासनिक उदासीनता और यात्रियों का आक्रोश
मुंबई और पुणे से अपने गृह नगरों की ओर जाने वाले प्रवासियों का कहना है कि निजी बस ऑपरेटरों की यह 'लूट' हर साल होती है, लेकिन इस बार दरें पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ रही हैं। यात्रियों का आरोप है कि परिवहन विभाग और राज्य सरकार के मंत्री इस पूरे मामले पर मूकदर्शक बने हुए हैं। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर लोग महाराष्ट्र सरकार के मंत्रियों के प्रति अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। लोगों का तर्क है कि यदि सरकार चाहे तो इन ऑपरेटरों पर लगाम लगा सकती है, लेकिन राजनीतिक संरक्षण के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है।
खोजी विश्लेषण: क्या है इस 'किराया माफिया' का सच?
हमारी टीम ने जब इस मामले की तह तक जाने की कोशिश की, तो पता चला कि निजी बस ऑपरेटरों का एक संगठित नेटवर्क है जो त्यौहारों के दौरान मांग बढ़ने का फायदा उठाता है। परिवहन विभाग के पास इन पर नियंत्रण रखने के लिए नियम तो हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन शून्य है। जब हमने संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया, तो जवाब मिला कि 'निजी बसें डायनेमिक प्राइसिंग मॉडल पर काम करती हैं'। हालांकि, यह तर्क आम जनता के गले नहीं उतर रहा है।












