प्रस्तावना: चमक-धमक के पीछे का सच
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद आज देश के सबसे गतिशील और तेजी से विकसित होने वाले महानगरों में शुमार है। 'साइबरबाद' के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बना चुका यह शहर आईटी सेक्टर, फार्मा और स्टार्टअप्स का प्रमुख हब बन चुका है। लेकिन, 'द फ्रीलांस' की इस खोजी रिपोर्ट में हम केवल चमकती कांच की इमारतों और फ्लाईओवर से आगे बढ़कर उस यथार्थ की पड़ताल कर रहे हैं, जो आम नागरिकों के जीवन को सीधे प्रभावित कर रहा है।
बुनियादी ढांचे पर बढ़ता दबाव और जल संकट
शहर के तेजी से विस्तार ने नगर निगम और शहरी नियोजन प्राधिकरण के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। एक ओर जहां हाई-टेक कॉरिडोर्स में अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं, वहीं पुराने हैदराबाद और बाहरी इलाकों में सीवेज सिस्टम, जलापूर्ति और सड़कों की स्थिति दयनीय होती जा रही है। मानसून के दौरान जलभराव की समस्या ने यह साबित कर दिया है कि हमारी ड्रेनेज प्रणाली अनियंत्रित शहरीकरण का बोझ उठाने में असमर्थ है। भूजल स्तर में भारी गिरावट और टैंकों (झीलों) पर हो रहे अतिक्रमण ने आने वाले समय के लिए एक बड़े पर्यावरणीय संकट की घंटी बजा दी है।
रियल एस्टेट का बूम और आम आदमी की पहुंच
हैदराबाद के रियल एस्टेट बाजार में पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व उछाल देखा गया है। विशेषकर गाचीबोवली, मधापुर, कोंडापुर और फाइनेंशियल डिस्ट्रिक्ट जैसे इलाकों में जमीन और मकानों के दाम आसमान छू रहे हैं। हालांकि, यह आर्थिक वृद्धि केवल एक वर्ग तक सीमित नजर आती है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए शहर के कोर एरिया में आशियाना खरीदना अब लगभग असंभव होता जा रहा है। उन्हें शहर के बाहरी छोर पर पलायन करना पड़ रहा है, जहां परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, विशेष रूप से एमएमटीएस और बसों के विस्तार की गति निजी वाहनों की बाढ़ के मुकाबले बेहद धीमी है, जिससे रोजाना ट्रैफिक जाम एक नासूर बनता जा रहा है।












