परिचय: पानी की तलाश में भटकता ग्रामीण भारत
द फ्रीलांस के विशेष अनुसंधान कक्ष और फील्ड रिपोर्टिंग टीम द्वारा ग्राउंड जीरो से जुटाई गई जानकारी के अनुसार, देश के कई हिस्सों में 'कुरुक्षेत्र' जैसे हालात पैदा होने लगे हैं। मौसम की बेरुखी और मानसून के असंतुलित वितरण ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। पानी की हर एक बूंद के लिए मच रहा यह हाहाकार केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि आने वाले भीषण जल संकट का एक चेतावनी संकेत है।
जल स्रोतों का सूखना और भूजल स्तर में भारी गिरावट
हमारी खोजी टीम ने जब विभिन्न राज्यों के सूखा प्रभावित जिलों का दौरा किया, तो स्थिति बेहद भयावह पाई गई। नदियां, तालाब और कुएं या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या फिर उनमें बचा हुआ पानी अब पीने योग्य नहीं बचा है। अंधाधुंध बोरवेल के चलते भूजल स्तर अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है। प्रशासन की ओर से चलाए जाने वाले राहत कार्य कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं, जबकि धरातल पर आम जनता बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रही है।
कृषि पर सीधा असर और किसानों का पलायन
कड़े संघर्ष के बावजूद किसानों की फसलें खेतों में ही सूख रही हैं। सिंचाई के कोई वैकल्पिक साधन उपलब्ध न होने के कारण खरीफ और रबी दोनों फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। रोजगार की तलाश में लोग अपने पुश्तैनी गांवों को छोड़ने पर मजबूर हैं, जिससे सामाजिक ताना-बाना भी बिखर रहा है.













