नमस्कार, मैं 'द फ्रीलांस' से वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर और खोजी पत्रकार। आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे विषय पर जो सीधे तौर पर आम नागरिकों की जान, सुरक्षा और जेब से जुड़ा है—'बस परिवहन प्रणाली'। देश के विभिन्न कोनों से हाल ही में सामने आए आंकड़े और घटनाएं इस बात की गवाही दे रहे हैं कि हमारी परिवहन व्यवस्था किस कदर पटरी से उतर चुकी है। एक तरफ जहाँ सड़क हादसों में बेकसूर लोग अपनी जान गंवा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ त्योहारी सीजन में बस ऑपरेटर्स की मुनाफाखोरी जनता का खून चूस रही है।
गुरुग्राम हादसा: लापरवाही की भेंट चढ़ी एक और जिंदगी
हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र गुरुग्राम से एक बेहद दहला देने वाली घटना सामने आई। यहाँ एक तेज रफ्तार सिटी बस ने स्कूटी सवार युवती को कुचल दिया। मृतका अपनी ड्यूटी समाप्त कर वापस घर लौट रही थी और एक निजी कंपनी में कार्यरत थी। यह घटना हमारे अर्बन ट्रांसपोर्ट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। बेकाबू रफ्तार से दौड़ती सिटी बसें और चालकों की मनमानी आए दिन सड़कों पर मासूमों की जान ले रही है। स्थानीय प्रशासन और यातायात विभाग की लापरवाही के कारण ये बसें सड़कों पर यमदूत साबित हो रही हैं, और सुरक्षा के कड़े दावों के बावजूद हादसों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है।
महिलाओं के लिए आरक्षित 'पिंक बस' में पुरुषों का कब्जा
शहरी परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शुरू की गई 'पिंक बस सेवा' की जमीनी हकीकत भी बेहद निराशाजनक है। कई मीडिया रिपोर्ट्स से यह खुलासा हुआ है कि महिलाओं के लिए विशेष रूप से चलाई जाने वाली ये बसें अब पुरुषों से भरी रहती हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर महिला यात्रियों को इन बसों में उनकी सुरक्षित जगह क्यों नहीं मिल पा रही है? प्रशासन की लचर मॉनिटरिंग और सुरक्षा कर्मियों की उदासीनता के चलते पिंक बसों का मूल उद्देश्य ही धूमिल होता नजर आ रहा है।












