शहरी विकास की अधूरी तस्वीर
भारत के तेजी से बढ़ते शहरी परिदृश्य में 'मेमपालम' यानी फ्लाईओवर का निर्माण विकास का पर्याय माना जाता है। एक वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर के रूप में, जब हम जमीनी हकीकत को देखते हैं, तो यह चमकती हुई कंक्रीट की संरचनाएं अक्सर एक अलग ही कहानी बयां करती हैं। फ्लाईओवर का मुख्य उद्देश्य यातायात के दबाव को कम करना और यात्रा के समय को घटाना होता है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है?
योजनाओं में खामियां और देरी
हमारी खोजी पड़ताल में यह सामने आया है कि अधिकांश फ्लाईओवर परियोजनाओं की नींव ही दोषपूर्ण नियोजन पर टिकी होती है। अक्सर, बिना किसी व्यापक ट्रैफिक इम्पैक्ट स्टडी के निर्माण कार्य शुरू कर दिए जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, निर्माण के दौरान वर्षों तक आम जनता को भारी जाम और प्रदूषण का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में, बजट का बार-बार पुनरीक्षण (Cost Escalation) यह संकेत देता है कि परियोजनाएं समय पर पूरी करने के बजाय उन्हें खींचने में किसी का निहित स्वार्थ हो सकता है।
गुणवत्ता और सुरक्षा पर सवाल
निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर उठने वाले सवाल सबसे गंभीर हैं। हाल के वर्षों में कई राज्यों में फ्लाईओवर के निर्माण के दौरान दरारें आने या संरचनात्मक कमजोरी की खबरें आई हैं। यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि जवाबदेही का अभाव है। जब हम ठेकेदारों और सरकारी अधिकारियों के गठजोड़ की बात करते हैं, तो 'मेमपालम' का निर्माण एक ऐसा क्षेत्र बन जाता है जहाँ पारदर्शिता का पूरी तरह से अभाव दिखता है।











