भूमिका: अनकही दास्तान
'द फ्रीलांस' के विशेष अनुसंधान में जब हमने देश के कृषि और किसान वर्ग की जमीनी हकीकत को टटोला, तो कई परतें खुलकर सामने आईं। नीति निर्माताओं के मंचों पर 'अन्नदाता' को रीढ़ की हड्डी बताया जाता है, किंतु धरातल पर इस रीढ़ पर अनगिनत बोझ और आर्थिक विसंगतियों की मार साफ देखी जा सकती है। यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन चेहरों की कहानी है जो पसीना बहाकर देश का पेट भरते हैं।
लागत और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का अंतर
कृषि विशेषज्ञों और जमीनी रिपोर्टिंग से यह स्पष्ट होता है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। खाद, बीज, डीजल और कीटनाशकों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन इसके अनुपात में किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना आज भी एक अबूझ पहेली बना हुआ है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर चल रही लंबी बहस और किसानों की कानूनी गारंटी की मांग इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं। बाजार की ताकतों और बिचौलियों के चंगुल में फंसकर किसान लगातार कर्ज के दलदल में धंसता चला जा रहा है।
कर्ज का जाल और मौसमी मार
जलवायु परिवर्तन ने किसानों की कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी बेमौसम बरसात, तो कभी भयंकर सूखा और बाढ़ किसानों की महीनों की मेहनत को पल भर में मिट्टी में मिला देते हैं। फसल बीमा योजनाओं के तमाम दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर मुआवजा समय पर न मिलना किसानों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। मजबूरन, साहूकारों और संस्थागत ऋणों के जाल में फंसकर किसान आत्महत्या जैसे चरम कदम उठाने को विवश हो रहे हैं। सरकारी आंकड़े भले ही राहत का दावा करें, लेकिन गांवों के भीतर का सच कहीं अधिक वीभत्स है।










