भूमिका: आधुनिक तकनीक और जनवितरण प्रणाली
द फ्रीलांस की विशेष खोजी रिपोर्ट में आज हम बात कर रहे हैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और उससे जुड़े 'राशन कार्ड' की। देश के करोड़ों नागरिकों के लिए राशन कार्ड केवल पहचान पत्र नहीं, बल्कि जीवनयापन का मुख्य आधार है। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इस पूरी प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए भारी भरकम तकनीकी बदलाव किए हैं, जिसमें 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' (ONORC) योजना सबसे प्रमुख है। हालांकि, कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी कई गहरीाइयां और विसंगतियां बनी हुई हैं, जिन्हें उजागर करना एक खोजी पत्रकार का कर्तव्य है।
डिजिटलीकरण और आधार सीडिंग की जमीनी हकीकत
हमारी फील्ड इन्वेस्टिगेशन टीम ने कई राज्यों के ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी इलाकों का दौरा किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राशन कार्डों का शत-प्रतिशत डिजिटलीकरण और आधार लिंकिंग का कार्य पूरा होने का दावा किया जाता है। लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है। कई बुजुर्ग और तकनीक से अनजान नागरिकों के लिए आज भी अपने राशन कार्ड में नाम जुड़वाना या आधार सीडिंग करवाना एक जटिल प्रक्रिया बनी हुई है। तकनीकी गड़बड़ियों, सर्वर डाउन रहने की समस्या और फिंगरप्रिंट मैच न होने के कारण कई पात्र परिवारों को महीने का राशन मिलने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
पात्रता के नए मानदंड और अपात्रों के नाम
एक ओर जहां नए पात्रता मानदंडों के तहत कई गरीब परिवारों के राशन कार्ड कथित तौर पर तकनीकी कारणों या मामूली आय वृद्धि के नाम पर रद्द कर दिए गए हैं, वहीं दूसरी ओर सिस्टम की कमियों के चलते कई जगहों पर अपात्र लोग अब भी इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मिलने वाले इस अधिकार से वंचित होना सीधे तौर पर मानवीय अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा का हनन है। स्थानीय स्तर पर कोटेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत के कई मामले भी सामने आए हैं, जहां कोटेदार तकनीक का बहाना बनाकर तय कोटे से कम राशन वितरित करते हैं।













