भूमिपुत्रों का संघर्ष और जमीनी हकीकत
'द फ्रीलांस' के विशेष खोजी अभियान के तहत जब हमने ग्रामीण भारत की गहराई में जाकर पड़ताल की, तो पाया कि 'अन्नदाता' कहे जाने वाले देश के किसान आज दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन ने उनकी फसलों को लगातार नुकसान पहुंचाया है, तो दूसरी तरफ कृषि आदानों (खाद, बीज, डीजल और कीटनाशक) की बढ़ती लागत ने उनकी कमर तोड़ दी है।
अर्थव्यवस्था की रीढ़ और अनदेखी चुनौतियां
भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र में आज भी बुनियादी ढांचे का भारी अभाव है। किसानों से जब ग्राउंड जीरो पर बात की गई, तो उनका दर्द छलक कर सामने आया। उनका कहना है कि पसीना बहाकर उगाई गई फसल जब बाजार में बिकने आती है, तो लागत मूल्य निकालना भी दूभर हो जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर चल रही लंबी बहस और विधिक गारंटी की मांग आज किसानों का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है।
बुनियादी ढांचे और भंडारण की कमी
हमारी खोजी टीम ने पाया कि देश के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी वैज्ञानिक भंडारण (Cold Storage) और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की भारी कमी है। इसके चलते किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बिचौलियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बिचौलियों का यह शिकंजा किसानों की आय को लगातार सीमित कर रहा है, जिससे वे कर्ज के दलदल में फंसते चले जा रहे हैं।












