भारतीय परिवहन और शहरी गतिशीलता (अर्बन मोबिलिटी) के इतिहास में स्कूटर हमेशा से एक केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। बीते कुछ वर्षों में, विशेषकर कोविड महामारी के बाद, व्यक्तिगत परिवहन के साधनों के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में अभूतपूर्व बदलाव आया है। 'द फ्रीलांस' की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में हम इसी ट्रेंडिंग विषय की गहराई में उतरकर यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर क्यों स्कूटर आज भारतीय मध्य वर्ग की पहली पसंद बनता जा रहा है।
पारंपरिक गियर वाले स्कूटरों से इलेक्ट्रिक क्रांति तक
साठ और सत्तर के दशक में धातु की बॉडी वाले गियर वाले स्कूटरों से शुरू हुआ सफर आज डिजिटल और स्मार्ट इलेक्ट्रिक स्कूटरों तक पहुंच चुका है। बाजार के आंकड़ों पर गौर करें तो पेट्रोल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता ने उपभोक्ताओं का रुझान इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की ओर तेजी से मोड़ा है। हालांकि, यह परिवर्तन जितना सहज दिखाई देता है, जमीनी हकीकत उतनी ही जटिल है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और बैटरियों के रीसायकल से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दे अभी भी ऐसे सवाल हैं जिनका संतोषजनक उत्तर उद्योग जगत को तलाशना बाकी है।
अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण पर प्रभाव
खोजी पड़ताल के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि स्कूटर सेगमेंट ने देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में महिलाओं के लिए यह आवागमन का सबसे सुलभ और सुरक्षित साधन बनकर उभरा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर के जानकारों का मानना है कि स्कूटरों की बिक्री में वृद्धि सीधे तौर पर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और गतिशीलता से जुड़ी हुई है। इसके अलावा, लास्ट-माइल डिलीवरी (अंतिम छोर तक आपूर्ति) के क्षेत्र में भी ई-स्कूटरों की मांग में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे गिग इकोनॉमी को एक नया संबल मिला है।










