प्रस्तावना: तेनी की भौगोलिक और रणनीतिक महत्ता
'द फ्रीलांस' के विशेष अनुसंधान दल ने जब तमिलनाडु के पश्चिमी घाट की तलहटी में बसे तेनी (Theni) जिले का रुख किया, तो सतह के नीचे सुलग रही कई परतें खुलकर सामने आईं। केरल की सीमा से सटा यह क्षेत्र केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और इलायची के बागानों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह दक्षिण भारत की राजनीति, भू-जल प्रबंधन और कृषि अर्थशास्त्र का एक संवेदनशील केंद्र भी है। पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र से जुड़ी कई ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं जिन्होंने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
कृषि संकट और जल प्रबंधन के मोर्चे पर चुनौतियां
हमारी खोजी टीम ने पाया कि तेनी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले खेती किसानी के पेशे पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मुल्लापेरियाड़ और वैगई बांध प्रणालियों से जुड़े होने के बावजूद, यहां के किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी के वास्ते संघर्ष करना पड़ रहा है। स्थानीय किसानों और कृषि संघों के प्रतिनिधियों से बातचीत में यह तथ्य सामने आया कि जल वितरण को लेकर अंतर-राज्यीय और प्रशासनिक नीतियां जमीनी स्तर पर विफल साबित हो रही हैं। इसके अलावा, अप्रत्याशित मौसमी बदलावों और मानसूनी अनिश्चितता ने पारंपरिक फसलों की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
पारिस्थितिकी असंतुलन और अवैध खनन का जाल
पश्चिमी घाट की संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर मानव हस्तक्षेप का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। हमारी पड़ताल बताती है कि तेनी के पहाड़ी इलाकों और आरक्षित जंगलों के आसपास अवैध उत्खनन (Illegal Mining) और अनियोजित पर्यटन का ग्राफ तेजी से ऊपर गया है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में वनों की कटाई और पहाड़ों के दोहन को तुरंत नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में यहां गंभीर भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। जिला प्रशासन ने हालांकि कुछ मामलों में कार्रवाई का दावा किया है, लेकिन धरातल पर मिलीभगत के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।












