प्रस्तावना: मैदान से बोर्डरूम तक क्रिकेट का सफर
'द फ्रीलेंस' की विशेष खोजी रिपोर्ट के इस अंक में हम बात कर रहे हैं उस खेल की, जो दीवानगी की हद तक करोड़ों दिलों पर राज करता है। क्रिकेट, जिसे कभी जेंटलमैन गेम यानी ভদ্রলোকদের খেলা (भद्द्र लोगों का खेल) कहा जाता था, आज अपनी पारंपरिक सीमाओं को लांघकर एक वैश्विक कार्पोरेट साम्राज्य में तब्दील हो चुका है। मैदान के चौकों-छक्कों से शुरू होने वाली यह कहानी अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोर्डरूम और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुकी है। हमारे खोजी तंत्र द्वारा जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि इस खेल का चरित्र पिछले एक दशक में पूरी तरह बदल गया है।
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पूरी रिपोर्ट पढ़ें→आर्थिक महाशक्ति और ग्लैमर का घालमेल
आईपीएल (IPL) और अन्य टी-20 लीगों के आगमन ने क्रिकेट को अर्थशास्त्र का एक ऐसा मॉडल बना दिया है जहां निवेश और मुनाफे का गणित राजनीति से भी जटिल हो गया है। मीडिया राइट्स, अरबों डॉलर की ब्रांड वैल्यू और खिलाड़ियों की नीलामी ने इस खेल को विशुद्ध रूप से व्यावसायिक बना दिया है। 'द फ्रीलेंस' की पड़ताल से यह बात सामने आती है कि पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट अब एक संकट के दौर से गुजर रहा है, जबकि टी-20 और टी-10 फॉर्मेट ने दर्शकों की प्राथमिकताओं को रातों-रात बदल डाला है। क्या यह बदलाव खेल की आत्मा का सौदा है या फिर समय की मांग? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर क्रिकेट प्रशासक देना नहीं चाहते।
भू-राजनीति और बोर्ड की खींचतान
खेल और कूटनीति का पुराना नाता रहा है, लेकिन क्रिकेट में यह अब और अधिक मुखर हो गया है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के फैसलों से लेकर विभिन्न देशों के क्रिकेट बोर्डों के बीच होने वाली आंतरिक खींचतान तक, हर जगह वर्चस्व की लड़ाई साफ देखी जा सकती है। राजस्व बंटवारे (Revenue Sharing) के मॉडल पर बड़े बोर्ड्स का एकाधिकार छोटे देशों के क्रिकेट ढांचे को कमजोर कर रहा है। 'द फ्रीलेंस' के पास मौजूद ग्राउंड रिपोर्ट्स यह दर्शाती हैं कि कैसे कुछ चुनिंदा देश वैश्विक क्रिकेट की दिशा और दशा तय कर रहे हैं, जिससे खेल की विविधता पर असर पड़ रहा है।











