ढाका: बांग्लादेश की जमीन पर एक बार फिर असंतोष का लावा फूट पड़ा है। राजधानी ढाका सहित देश के कई प्रमुख औद्योगिक इलाकों में आम लोग और खासकर कपड़ा मजदूर एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं। हालात इस कदर बेकाबू हो गए हैं कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें आम बात बन गई हैं। 'द फ्रीलेंस' की विशेष पड़ताल में यह बात सामने आई है कि यह महज एक साधारण विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और भू-राजनीतिक निहितार्थ छिपे हुए हैं।
कपड़ा उद्योग पर संकट और फैक्ट्रियों में तालाबंदी
बांग्लादेश की रीढ़ कहे जाने वाले वस्त्र (गारमेंट) उद्योग पर इस समय भारी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विभिन्न मीडिया स्रोतों और हमारी फील्ड रिपोर्ट के अनुसार, हिंसक प्रदर्शनों और आगजनी की घटनाओं के बाद देश भर में 600 से अधिक फैक्ट्रियों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा है। कुछ रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 264 से अधिक कपड़ा इकाइयों पर सीधे ताले लगने की पुष्टि करता है। मजदूरों का आरोप है कि उन्हें समय पर वेतन नहीं मिल रहा है और महंगाई के इस दौर में उनका गुजर-बसर करना असंभव हो गया है। न्यूनतम मजदूरी और बकाया भुगतान की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब व्यापक हिंसक रूप ले चुका है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है।
प्रदर्शनों की आड़ में भारत विरोधी भावनाएं
हमारी खोजी टीम ने पाया है कि इन सामाजिक-आर्थिक प्रदर्शनों के दौरान एक खतरनाक पैटर्न देखने को मिल रहा है। प्रदर्शनकारियों के बीच से लगातार भारत विरोधी नारे गूंज रहे हैं। सवाल यह उठता है कि आर्थिक और श्रम संबंधी मांगों को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों में अचानक दिल्ली और भारत के खिलाफ जहर क्यों घोला जा रहा है? विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश के भीतर कुछ ऐसे तत्व सक्रिय हैं जो घरेलू असंतोष को भारत विरोधी भावनाओं में बदलकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहते हैं। गंगा जल संधि से लेकर जापान के सहयोग से चल रहे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं तक को इस माहौल के कारण अब गंभीर खतरा पैदा हो गया है।












