इजराइल की राजनीति एक बार फिर ऐसे चौराहे पर आ खड़ी है जहां किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा है। 73 लाख से अधिक मतदाताओं वाले इस देश में जब चुनाव संपन्न होते हैं और कोई भी पार्टी नेसेट (संसद) में जादुई आंकड़ा पार नहीं कर पाती, तो देश में राजनीतिक जोड़तोड़ और लंबी वार्ताओं का दौर शुरू हो जाता है। द फ्रीलांस की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में हम यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर इसराइल जैसी अनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में सरकार का गठन कैसे होता है और कैसे छोटे दल किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं।
अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की जटिलताएं
इजराइल की चुनावी प्रणाली पूरी तरह से आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) पर आधारित है। यहाँ पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और जो पार्टी या गठबंधन न्यूनतम 3.25 प्रतिशत का चुनावी अवरोध पार कर लेता है, उसे 120 सदस्यीय नेसेट में उसके वोट शेयर के हिसाब से सीटें मिल जाती हैं। इस व्यवस्था का परिणाम यह होता है कि संसद में कई छोटे-छोटे दल पहुँच जाते हैं। यही वजह है कि इतिहास में शायद ही कभी किसी एक पार्टी को अकेले 61 सीटों का जादुई बहुमत मिला हो।
राष्ट्रपति की भूमिका और सरकार बनाने का आमंत्रण
जब चुनाव परिणाम आ जाते हैं और किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब इजराइल के राष्ट्रपति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रपति सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ औपचारिक परामर्श करते हैं। इसके बाद वे उस पार्टी के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं, जिसके पास सबसे अधिक सांसदों का समर्थन जुटाने की संभावना होती है। आमतौर पर यह चुनाव जीतने वाले सबसे बड़े दल का नेता होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वही प्रधानमंत्री बने।













