'द फ्रीलांस' विशेष रिपोर्ट
भारतीय न्यायपालिका और विधायी तंत्र के बीच अधिकारों के विभाजन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना में, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। मामला लोकसभा और राज्यसभा की आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने याचिकाकर्ता को जो टिप्पणी की, उसने एक बार फिर न्यायपालिका की सीमा और लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे पर एक राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने संसद के दोनों सदनों में एससी और एसटी के लिए आरक्षित सीटों के निश्चित समय पर होने वाले फेरबदल यानी रोटेशन को चुनौती दी थी और इस संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी। लेकिन अदालत ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने बेहद सख्त और स्पष्ट शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ता ने 'गलत नंबर डायल किया है'। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय जनता या याचिकाकर्ताओं को सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए, क्योंकि यह नीतिगत और विधायी मामला है, न कि न्यायिक समीक्षा का।
खोजी विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी संवैधानिक शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को रेखांकित करती है। न्यायपालिका यह बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि कानून बनाना, उनमें संशोधन करना या सीटों का परिसीमन और रोटेशन तय करना संसद और चुनाव आयोग का कार्यक्षेत्र है। अदालतें नीतिगत मामलों में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने से बचती हैं। हालांकि, CJI द्वारा 'विरोध-प्रदर्शन' करने की सलाह दिए जाने पर कानूनी जानकारों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह अदालत का लोकतांत्रिक असंतोष जताने के हक को याद दिलाना है, तो वहीं कुछ इसे न्यायिक उदासीनता के रूप में भी देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि हर सामाजिक या राजनीतिक समस्या का समाधान अदालत के आदेशों से नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतिगत बदलावों के लिए संसद और जनता के बीच की राजनीतिक प्रक्रिया ही मुख्य माध्यम है। 'द फ्रीलांस' की इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से आगे की कानूनी रणनीतियों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, परंतु इस टिप्पणी ने देश के राजनीतिक गलियारों में एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।










