दक्षिण भारतीय सिनेमा के क्षितिज पर जब 'मक्कल सेलवन' (जनता के प्रिय) विजय सेतुपति का नाम आता है, तो एक ऐसे कलाकार की छवि उभरती है जिसने रूढ़िवादी नायक की परिभाषा को पूरी तरह से बदल दिया। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर सिनेमा के शिखर तक पहुंचने की विजय सेतुपति की यह यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है। 'द फ्रीलेंस' की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में हम उनके जीवन के उन अनछुए पहलुओं और संघर्षों को खंगाल रहे हैं, जिन्होंने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचाया है।
संघर्ष से सफलता तक का कठिन सफर
विजय सेतुपति का शुरुआती जीवन आसान नहीं था। अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने कई तरह के छोटे-मोटे काम किए। दुबई में अकाउंटेंट की नौकरी से लेकर चेन्नई की सड़कों पर धक्के खाने तक, उनका जीवन संघर्षों की एक लंबी दास्तान है। निर्देशक बालू महेंद्र की सलाह ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी। शुरुआती दौर में उन्हें केवल साइड रोल या पृष्ठभूमि के किरदार मिले, लेकिन उन्होंने अपनी हर छोटी भूमिका में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
एंटी-हीरो से पैन-इंडिया स्टार तक
साल 2012 में आई फिल्म 'थीनम पोदु तमिल थाराई' और उसके बाद 'सुदप्पु कव्वाल सूटू' ने उन्हें तमिल सिनेमा में स्थापित कर दिया। सेतुपति की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने पारंपरिक नायक की छवि को कभी नहीं अपनाया। उन्होंने एक खलनायक के रूप में भी उतनी ही सहजता से काम किया जितनी सहजता से एक मुख्य अभिनेता के रूप में। लोकेश कनगराज की फिल्म 'विक्रम' में अमर या विक्रम के सामने खड़े मुख्य खलनायक के रूप में उनका अभिनय भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया। इसके अलावा, हिंदी सिनेमा में शाहरुख खान के साथ फिल्म 'जवान' में उनके नकारात्मक किरदार ने उन्हें पैन-इंडिया स्तर पर एक नई पहचान दिलाई।












