आधुनिक भारत में जहां एक ओर यूपीआई (UPI) और डिजिटल ट्रांजैक्शन ने वित्तीय लेन-देन को पलक झपकते ही संभव बना दिया है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली का एक अहम हिस्सा रहा 'चेक' (Cheque) अब अपराधियों के निशाने पर आ गया है। 'द फ्रीलेंस' की विशेष टीम द्वारा की गई पड़ताल से यह खुलासा हुआ है कि वित्तीय साक्षरता की कमी और सुरक्षा मानकों में ढिलाई के चलते चेक बाउंस और चेक क्लोनिंग के मामले खतरनाक स्तर पर बढ़ रहे हैं।
पारंपरिक बैंकिंग और आधुनिक खतरे
कभी धन के लेन-देन का सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय माध्यम माना जाने वाला चेक आज संगठित अपराध का जरिया बनता जा रहा है। जांच के दौरान यह बात सामने आई कि साइबर अपराधी और स्थानीय ठग गिरोह उन खाताधारकों को निशाना बना रहे हैं जो चेक बुक का इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन अपने बैंक खातों के मिलान और बैंक स्टेटमेंट की नियमित जांच में लापरवाही बरतते हैं। फर्जी हस्ताक्षर, चेक की राशि में हेरफेर और 'चेक क्लोनिंग' जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर खातों से रकम उड़ाई जा रही है।
कानूनी और बैंकिंग लूपहोल
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन अदालतों में लंबित मामलों के अंबार के कारण पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं। अपराधियों को इसी कानूनी सुस्ती का फायदा मिलता है। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि फर्जी कंपनियों के नाम पर शेल अकाउंट्स (Shell Accounts) खोले जाते हैं, जिनका उपयोग केवल अवैध चेक ट्रांजैक्शन और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया जाता है। बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या केवाईसी (KYC) प्रक्रिया में ढिलाई इन घोटालों को और बढ़ावा दे रही है.











