नई दिल्ली: 'द फ्रीलेंस' के लिए विशेष खोजी रिपोर्ट। भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों एक ही शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा है—'ग्रे मार्केट'। आईपीओ (IPO) के आने से पहले ही शेयरों की अनौपचारिक खरीद-फरोख्त का यह समानांतर बाजार निवेशकों के बीच कौतूहल और मुनाफे का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। हाल ही में बाजार में आए बड़े आईपीओ और विशेषकर जियो प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी हलचल ने इस अनौपचारिक बाजार के समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
मीडिया स्रोतों से मिले आंकड़ों और हमारी स्वतंत्र ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, आईपीओ के बाजार में उतरने के पहले ही दिन निवेशकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिला है। शुरुआती आंकड़ों गवाह हैं कि कुछ आईपीओ अपने लॉन्च के पहले ही दिन 9.62 गुना तक सब्सक्राइब हो चुके हैं। इस भारी मांग का सीधा असर ग्रे मार्केट प्रीमियम यानी जीएमपी (GMP) पर साफ नजर आ रहा है। जहां शुरुआती दौर में प्रीमियम महज 43 रुपये के आसपास चल रहा था, वहीं जियो जैसे बड़े दिग्गजों के मामले में यह उछलकर 244 रुपये तक पहुंच गया है, जो लगभग 21.81% तक के संभावित प्रीमियम लिस्टिंग की ओर इशारा करता है।
ग्रे मार्केट: जोखिम और मुनाफे का अनौपचारिक गलियारा
खोजी पत्रकारिता के लिहाज से यह समझना बेहद जरूरी है कि ग्रे मार्केट आखिर है क्या? यह कोई वैधानिक या सेबी (SEBI) द्वारा विनियमित बाजार नहीं है, बल्कि यह दलाल स्ट्रीट की पृष्ठभूमि में चलने वाला एक ऐसा सौदा है जहां शेयरों के आधिकारिक आवंटन (Allotment) से पहले ही उनकी खरीद-फरोख्त तय हो जाती है। निवेशकों और सट्टेबाजों के बीच यह इस बात का पैमाना माना जाता है कि लिस्टिंग के दिन शेयर किस दिशा में जाएंगे। हालांकि, वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रे मार्केट के आंकड़े हमेशा शत-प्रतिशत सटीक नहीं होते, लेकिन यह बाजार के रुझान को भांपने का एक मजबूत संकेतक जरूर है।
जिओ प्लेटफॉर्म्स के संभावित आईपीओ और उसकी बंबई स्टॉक एक्सचेंज (BSE) तथा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर होने वाली आगामी लिस्टिंग ने निवेशकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। बाजार के जानकारों का आकलन है कि यदि जियो की लिस्टिंग उम्मीद के मुताबिक मजबूत रही, तो यह देश की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी बनने का गौरव भी हासिल कर सकती है। यही वजह है कि ग्रे मार्केट में इसके शेयरों की मांग आसमान छू रही है और हर कोई इस दौड़ में सबसे आगे निकलना चाहता है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और हमारी पड़ताल
'द फ्रीलेंस' की इस खोजी पड़ताल में यह बात भी सामने आई है कि ग्रे मार्केट में निवेश करना पूरी तरह से जोखिम भरा होता है। चूंकि इसे किसी विनियामक संस्था की कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए किसी भी प्रकार के विवाद या वित्तीय नुकसान की स्थिति में निवेशक के पास कानूनी सुरक्षा के विकल्प बेहद सीमित होते हैं। इसके बावजूद, मुनाफे की अंधी दौड़ ने आम निवेशकों को भी इस जोखिम भरे रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया है।
बहरहाल, कल एनएसई और बीएसई पर होने वाली लिस्टिंग यह तय करेगी कि ग्रे मार्केट के अनुमान जमीनी हकीकत में कितने तब्दील होते हैं। क्या जियो का यह आईपीओ निवेशकों की झोली में उम्मीद के मुताबिक मुनाफा डाल पाएगा या ग्रे मार्केट का यह बुलबुला फुस्स साबित होगा? हमारी पैनी नजर इस पूरे घटनाक्रम पर बनी रहेगी। 'द फ्रीलेंस' निवेशकों से यही अपील करता है कि वे सुनी-सुनाई बातों या केवल ग्रे मार्केट के संकेतों के आधार पर अंधाधुंध निवेश करने से बचें और कंपनी के फंडामेंटल्स को प्राथमिकता दें।