दवाओं की आसमान छूती कीमतें और मरीजों की जेब पर डाका
'द द फ्रीलेंस' की विशेष खोजी रिपोर्ट। भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एक बार फिर मुनाफाखोरी और आम आदमी की लाचारी का गंभीर मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने खुदरा बाजार में जीवनरक्षक और आवश्यक दवाओं की कीमतें उनके निर्माण लागत से 200 गुना तक अधिक होने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए यह जानने की कोशिश की है कि आखिर इस खुली लूट पर अब तक लगाम क्यों नहीं लगाई जा सकी है।
मरीजों से लूट क्यों? न्यायपालिका की कड़ी फटकार
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश का एक बड़ा वर्ग पहले ही स्वास्थ्य सेवाओं के भारी-भरकम खर्च के बोझ तले दबा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, दवा कंपनियों और फार्मास्युटिकल डिस्ट्रीब्यूटर्स द्वारा जेनेरिक से लेकर ब्रांडेड दवाओं तक पर भारी-भरकम मार्जिन वसूला जा रहा है। निर्माण लागत कुछ ही रुपयों की होती है, लेकिन मरीज तक पहुंचते-पहुंचते वही दवा सैकड़ों गुना महंगी हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की मुनाफाखोरी को कैसे अनुमति दी जा रही है।
नियामक तंत्र की विफलता और नीतिगत सुधारों की दरकार
विशेषज्ञों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का लंबे समय से यह मानना रहा है कि देश में मूल्य नियंत्रण प्रणाली (Price Control Mechanism) में कई खामियां हैं। नेशनल लिस्ट ऑफ इसेन्शियल मेडिसिन्स (NLEM) के दायरे से बाहर की कई दवाएं खुलेआम अपनी मनमानी कीमतों पर बिक रही हैं। 'द फ्रीलेंस' की पड़ताल बताती है कि फार्मा कंपनियों के मजबूत लॉबिंग और प्रशासनिक शिथिलता के कारण सख्त कानून धरातल पर पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं।
आगे की राह: क्या मरीजों को मिलेगी राहत?
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब यह देखना बेहद अहम होगा कि केंद्र सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाते हैं। क्या सरकार दवाओं के दाम तय करने वाले तंत्र को और अधिक पारदर्शी और सख्त बनाएगी, या फिर यह मामला महज कानूनी बहसों तक ही सीमित रहकर रह जाएगा? देश भर के करोड़ों मरीजों की निगाहें अब सर्वोच्च न्यायालय के अगले आदेश और सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं।