प्रस्तावना: जब धरती अपनी नमी खो देती है
जब आसमान से पानी की एक बूंद भी नहीं गिरती और ज़मीनी सीना चीरकर बाहर आने वाली नमी दम तोड़ने लगती है, तो जन्म होता है उस भयानक वास्तविकता का जिसे स्थानीय भाषा में 'कరువు' यानी सूखा कहा जाता है। 'द फ्रीलांस' के विशेष खोजी अभियान के तहत हमने देश के उन हिस्सों का दौरा किया जहां सूखे ने इंसानों ही नहीं, बल्कि पूरी पारिस्थितिकी को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ पानी की कमी का संकट नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी मानवीय त्रासदी है जो धीरे-धीरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ रही है।
ज़मीनी हालात: दरकते खेत और सूखे बोरवेल
हमारी फील्ड टीम ने जब प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, तो हर तरफ टूटे हुए सपने और सूखी ज़मीन दिखाई दी। कभी लहलहाने वाले खेत आज बंजर और सफेद नमक की परत से ढंके हुए हैं। किसानों ने बताया कि उन्होंने फसलों को बचाने के लिए हज़ारों रुपए उधार लेकर बोरवेल तो खुदवाए, लेकिन दो सौ फीट नीचे भी पानी नहीं मिला। नतीजा यह है कि किसान कर्ज के जाल में फंसते चले जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच का यह अंतर बेहद चिंताजनक है। राहत पैकेज के नाम पर मिलने वाली कागजी सहायता तक पीड़ितों तक नहीं पहुंच पा रही है, जिससे भ्रष्टाचार की परतें भी उजागर होती हैं।
अर्थव्यवस्था और पलायन की मार
सूखे का सबसे भयानक असर ग्रामीण मजदूरों और छोटे किसानों पर पड़ा है। खेती ठप होने के कारण रोजगार के अवसर समाप्त हो चुके हैं। गांवों के गांव खाली हो रहे हैं क्योंकि युवा आजीविका की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। बुजुर्ग और महिलाएं पीछे छूट गए हैं जो रोजमर्रा की एक बाल्टी पानी के लिए मीलों पैदल चलने को विवश हैं। मवेशियों की स्थिति तो और भी दयनीय है; चारे और पानी के अभाव में पशुधन दम तोड़ रहा है, जो ग्रामीण परिवारों की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत हुआ करता था।










