दीपावली भारत का सबसे प्रमुख और प्रकाश का पर्व है, जिसे सदियों से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। सनातन संस्कृति में इस त्योहार का मुख्य आधार घरों को दीपों से सजाना, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करना तथा मिठाइयां बांटना रहा है। हालांकि, समय के साथ इस पर्व के मनाने के तरीकों में कई बदलाव आए हैं, जिनमें सबसे बड़ा बदलाव पटाखों और आतिशबाजी का जुड़ना है। 'द फ्रीलांस' की इस खोजी रिपोर्ट में हम यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर दीपावली के इस प्राचीन उत्सव में पटाखों की एंट्री कब और कैसे हुई।
प्राचीन भारत में कैसे मनता था रोशनी का पर्व?
ऐतिहासिक और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, प्राचीन काल में दीपावली पूरी तरह से सादगी और पर्यावरण के अनुकूल मनाई जाती थी। त्रेता युग में जब भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास काटकर और रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में घी के दीये जलाए थे। उस समय आतिशबाजी या बारूद का कोई अस्तित्व नहीं था। वैदिक काल से लेकर मध्यकाल तक रोशनी का यह पर्व केवल मिट्टी के दीयों, तेल, कपूर और मोमबत्तियों तक ही सीमित था। उत्सव का मुख्य उद्देश्य आंतरिक अंधकार को मिटाकर ज्ञान और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाना था।
इतिहास के पन्नों में बारूद और पटाखों का आगमन
भारत में बारूद का इतिहास प्राचीन नहीं है, बल्कि यह मध्यकाल के दौरान विदेशी आक्रमणकारियों और मुगलों के साथ यहां आया। हालांकि, शुरुआत में बारूद का उपयोग मुख्य रूप से युद्ध के मैदानों में हथियारों और तोपों के रूप में किया जाता था। धीरे-धीरे इसका इस्तेमाल शाही दरबारों के मनोरंजन, युद्ध विजय के जश्न और रानियों के महलों में होने वाले आयोजनों में आतिशबाजी के रूप में होने लगा। इतिहासकार बताते हैं कि 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौरान मुगल काल में बारूद आधारित पटाखों का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ा, लेकिन आम जनजीवन और विशेषकर दीपावली जैसे धार्मिक पर्वों में इनकी पैठ होने में अभी लंबा समय बाकी था।
दीपावली और पटाखों का मेल: कब शुरू हुई आतिशबाजी?
दीपावली के त्योहार के साथ पटाखों के जुड़ने की वास्तविक शुरुआत ब्रिटिश काल और उसके बाद के दशकों में मानी जाती है। जैसे-जैसे रासायनिक विज्ञान का विकास हुआ और स्थानीय स्तर पर बारूद व गंधक का व्यापार बढ़ा, लोगों ने इसे खुशी के इजहार का माध्यम बनाना शुरू कर दिया। 19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20वीं सदी की शुरुआत तक आते-आते बंगाल और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में आतिशबाजी का निर्माण छोटे पैमाने पर शुरू हो चुका था। स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत में जब रासायनिक उद्योगों का विस्तार हुआ, विशेषकर तमिलनाडु का शिवकाशी क्षेत्र पटाखों के निर्माण का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा, तब दीपावली और पटाखे एक-दूसरे के पर्याय बन गए।
वर्तमान परिदृश्य और बदलती सोच
आज के दौर में दीपावली पर पटाखों की मौजूदगी एक बड़ा बहस का मुद्दा बन चुकी है। जहां एक ओर इसे आधुनिक उल्लास का हिस्सा माना जाता है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के कारण इस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) के कड़े निर्देशों के बाद अब समाज का एक बड़ा वर्ग फिर से प्राचीन परंपरा यानी 'दीये वाली दीपावली' की ओर लौट रहा है। इतिहास गवाह है कि दीपावली का मूल स्वरूप आतिशबाजी का नहीं, बल्कि केवल प्रकाश और भाईचारे का था। समय के साथ आए इन बदलावों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में इस पर्व का स्वरूप क्या दिशा लेता है।











