नयी दिल्ली/लंदन: 'द फ्रीलेंस' की विशेष खोजी रिपोर्ट। इन दिनों वैश्विक मंच पर एक सुगबुगाहट तेज हो गई है। दुनिया के तमाम ताकतवर देश, विशेषकर अमेरिका, ब्रिटेन और जापान अपने नागरिकों को घरों में 'इमरजेंसी राशन' और आपातकालीन सामग्री जमा करने की सलाह दे रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या वैश्विक स्तर पर कुछ बहुत बड़ा होने वाला है? क्या यह किसी आसन्न महायुद्ध, आर्थिक मंदी या फिर जलवायु परिवर्तन के किसी भयानक प्रकोप की पूर्व तैयारी है?
1000 दिनों का काउंटडाउन और पश्चिमी देशों की नीतियां
प्राप्त मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि पश्चिमी देशों की सरकारों ने अपने नागरिकों के लिए 'सिविल डिफेंस' के पुराने नियमों को फिर से सक्रिय कर दिया है। नागरिकों से कहा जा रहा है कि वे कम से कम 72 घंटों से लेकर हफ्तों तक का सूखा राशन, पेयजल, दवाइयां और संचार उपकरण अपने घरों में सुरक्षित रखें। जापान में तो प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ भू-राजनीतिक तनावों के मद्देनजर यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों द्वारा इसे जन-अभियान के रूप में चलाना गहरी चिंता का विषय है। जानकारों का मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व का सुलगता संघर्ष और ताइवान को लेकर चीन के साथ बढ़ते तनाव ने महाशक्तियों की नींद उड़ा दी है।
तकनीकी भविष्य और आर्थिक मोर्चे पर हलचल
एक तरफ जहां कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर आपातकालीन तैयारियां चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर तकनीक की दुनिया में भी बड़े बदलावों के संकेत मिल रहे हैं। एलन मस्क जैसे दिग्गज उद्यमियों ने एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और रोबोट्स के भविष्य को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मस्क के विजन के अनुसार, आने वाले समय में रोबोट्स इंसानी श्रम की जगह ले लेंगे, जिससे प्रचुरता तो आएगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के चरमराने का भी बड़ा खतरा है। क्या इन तमाम तकनीकी और भू-राजनीतिक बदलावों का कोई गहरा अंतर्संबंध है?













