धनुष: अभिनय से वैश्विक फलक तक का सफर
दक्षिण भारतीय सिनेमा के क्षितिज पर अपनी अनूठी शैली और सहज अभिनय क्षमता से छा जाने वाले अभिनेता धनुष (Dhanush) आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले और निर्देशक कस्तूरी राजा के पुत्र के रूप में जन्मे वेंकटेश प्रभु कस्तूरी राजा, जिन्हें दुनिया 'धनुष' के नाम से जानती है, का यह सफर कतई आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में उनके रंग-रूप और कद-काठी को लेकर सोशल मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री के एक वर्ग द्वारा की गई आलोचनाओं ने उन्हें अंदर तक प्रभावित किया, लेकिन उन्होंने नकारात्मकता को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी प्रेरणा बनाया।
'थुल्लुवाधो इलमई' से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कारों तक
वर्ष 2002 में रिलीज हुई फिल्म 'थुल्लुवाधो इलमई' से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले धनुष ने अपनी शुरुआती फिल्मों में ही अपने अभिनय कौशल की अमिट छाप छोड़ी। इसके बाद आई फिल्म 'कधल कोंडैन' और 'किल्ली' जैसी फिल्मों ने उन्हें तमिल सिनेमा का उभरता हुआ सितारा बना दिया। हालांकि, उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म 'आदुकलम' (2011), जिसमें उन्होंने एक मु्क्कड़बाज की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने न केवल उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया, बल्कि समीक्षकों के बीच भी उनकी एक गंभीर कलाकार के रूप में प्रतिष्ठा स्थापित की।
वैश्विक स्तर पर पहचान और 'रॉकस्टार' छवि
धनुष की लोकप्रियता का दायरा सिर्फ दक्षिण भारत तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2011 में इंटरनेट पर रातों-रात सनसनी मचाने वाला उनका गाना 'कोलावड़ी डी' (Kolaveri Di) वैश्विक स्तर पर ट्रेंड करने वाला पहला भारतीय गानों में से एक बना। इस गाने ने साबित कर दिया कि भाषा की दीवारें संगीत और कला के आगे कमजोर पड़ जाती हैं। इसके बाद उन्होंने बॉलीवुड में भी अपनी किस्मत आजमाई और आनंद एल. राय की फिल्म 'रांझणा' (2013) से हिंदी सिनेमा के दर्शकों का दिल जीत लिया। कुंदन के किरदार में उनके भावुक अभिनय ने उत्तर भारत के दर्शकों को भी उनका मु मुरीद बना दिया।















