परिचय: सफेद सोने की चमक फीकी
भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में 'पత్తి' (कपास) को हमेशा से 'सफेद सोना' माना जाता रहा है। देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों से मिल रही जमीनी रिपोर्ट बताती है कि यह नकदी फसल अब किसानों के लिए मुनाफे का सौदा नहीं, बल्कि गहरे संकट का पर्याय बनती जा रही है। 'द फ्रीलांस' की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में हम यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर वे कौन से कारक हैं जो किसानों को इस पारंपरिक खेती से दूर करने पर मजबूर कर रहे हैं।
लागत में बेतहाशा वृद्धि और कीटों का हमला
फील्ड सर्वे के दौरान किसानों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में बीजों, उर्वरकों और कीटनाशकों के दामों में भारी उछाल आया है। इसके विपरीत, फसलों में गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) जैसे कीटों के प्रकोप ने उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचाया है। किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए महंगे कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत आसमान छू रही है। इसके बावजूद जब फसल मंडी में पहुंचती है, तो कीट जनित क्षति के कारण उन्हें लागत मूल्य भी मुश्किल से मिल पाता है।
बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का अंतर
सरकारी दावों के बावजूद किसानों को एमएसपी का पूरा लाभ मिल रहा है या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है। मंडियों में बिचौलियों का वर्चस्व आज भी कायम है। किसानों का आरोप है कि नमी और गुणवत्ता के नाम पर उनकी उपज को कम दाम पर खरीदा जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आयात नीतियों का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है, जिससे स्थानीय किसानों की कमर टूट जाती है।












