द फ्रीलांस की विशेष खोजी रिपोर्ट। भारतीय सर्राफा बाजार से लेकर वैश्विक जिंस एक्सचेंजों तक, सफेद धातु यानी 'वेండి' (तेलुगु में चांदी) इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। एक ओर जहां सुरक्षित निवेश के विकल्प के तौर पर निवेशकों का रुझान इसकी तरफ बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक क्षेत्रों से इसकी मांग में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। हमारी फील्ड इन्वेस्टिगेशन टीम ने जब देश के प्रमुख सराफा बाजारों और मेटल हब का दौरा किया, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
औद्योगिक मांग और निवेशकों की दोहरी भूमिका

ताइवान इंडेक्स और भू-राजनीतिक हलचल: वैश्विक बाजारों पर क्या है असर
पूरी रिपोर्ट पढ़ें→विभिन्न मीडिया स्रोतों और बाजार के जानकारों से मिले आंकड़ों के मुताबिक, 'वेండి' की कीमतों में हालिया बदलाव के पीछे केवल पारंपरिक आभूषणों की मांग नहीं है, बल्कि सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आधुनिक उद्योगों में इसकी खपत का बड़ा हाथ है। ग्रीन एनर्जी की तरफ बढ़ते वैश्विक रुझान के कारण चांदी की औद्योगिक मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। हालांकि, अमेरिकी डॉलर के सूचकांक और वैश्विक केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों से जुड़ी नीतियों के कारण इसमें लगातार सट्टेबाजी का माहौल भी बना हुआ है।
स्थानीय बाजार और खुदरा निवेशकों की स्थिति
जमीनी स्तर पर पड़ताल करने पर पता चला कि खुदरा निवेशक 'वेండి' को लेकर असमंजस में हैं। एक तरफ जहां कीमतों के ऑल-टाइम हाई छूने की संभावना जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी के लिए यह धातु अब महंगी होती जा रही है। स्थानीय सराफा व्यापारियों का कहना है कि लोग छोटे सिल्लियों और सिक्कों में निवेश तो कर रहे हैं, लेकिन कीमतों में भारी अस्थिरता के कारण बड़े पैमाने पर बुकिंग रुक गई है। तस्करों और अनधिकृत आयातों पर भी सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर बनी हुई है, ताकि बाजार में कृत्रिम कमी या हेरफेर को रोका जा सके।










